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Drunk as Drunk On Turpentine

  Drunk as Drunk On Turpentine Drunk as drunk on turpentine From your open kisses, Your wet body wedged Between my wet body and the strake Of our boat that is made of flowers, Feasted, we guide it - our fingers Like tallows adorned with yellow metal - Over the sky's hot rim, The day's last breath in our sails. Pinned by the sun between solstice And equinox, drowsy and tangled together We drifted for months and woke With the bitter taste of land on our lips, Eyelids all sticky, and we longed for lime And the sound of a rope Lowering a bucket down its well. Then, We came by night to the Fortunate Isles, And lay like fish Under the net of our kisses.

Radha Kripa Kataksh Stotram | राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र हिंदी

Radha Kripa Kataksh Stotram | राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र हिंदी 

श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र (Shri Radha Kripa Kataksh Stotram) ब्रज भूमि और वैष्णव परंपरा का एक अत्यंत प्रभावशाली और मधुर स्तोत्र है। यह श्री राधा रानी की स्तुति में गाया जाता है।


1. परिचय और महत्व

यह स्तोत्र भगवान शिव द्वारा रचित माना जाता है। "कटाक्ष" का अर्थ है तिरछी नजर या कृपा भरी दृष्टि। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त राधा रानी से प्रार्थना करता है कि वे केवल एक बार अपनी करुणा भरी दृष्टि (नजर) उस पर डाल दें, जिससे उसका जीवन धन्य हो जाए।

वैष्णव संप्रदाय में राधा जी को "ह्लादिनी शक्ति" और कृष्ण की भी आराध्या माना गया है। भक्त मानते हैं कि श्री कृष्ण की पूर्ण कृपा पाने के लिए राधा जी की कृपा अनिवार्य है।

2. मुख्य विशेषताएं

ब्रज का आधार: यह स्तोत्र बरसाना (राधा जी का जन्मस्थान) में अत्यंत लोकप्रिय है। वहाँ के मंदिरों में इसका गान प्रतिदिन होता है।

छंद और लय: इसकी रचना अत्यंत लयबद्ध है, जिससे इसे गाना बहुत सुरीला और आनंदमय होता है।

गहन भाव: इसमें राधा जी के स्वरूप, उनके श्रृंगार, उनकी लीलाओं और उनकी सर्वोच्च सत्ता का वर्णन किया गया है।


3. स्तोत्र की संरचना

इस स्तोत्र में मुख्य रूप से राधा रानी के विभिन्न रूपों की वंदना की गई है:

वे वृषभानु की पुत्री हैं।

वे गोपियों की स्वामिनी और रासलीला की प्राण हैं।

वे करुणा की सागर हैं।

वे समस्त वेदों और शास्त्रों का सार हैं।


4. पाठ करने के लाभ

मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

कृष्ण भक्ति की प्राप्ति: राधा रानी की कृपा से भक्त को श्री कृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त होता है।

पापों का नाश: यह स्तोत्र मन को शुद्ध करता है और संचित पापों से मुक्ति दिलाता है।

मानसिक शांति: इसके उच्चारण मात्र से हृदय में शांति और आनंद का अनुभव होता है।

मनोकामना पूर्ति: सच्चे मन से पाठ करने पर सांसारिक और आध्यात्मिक कष्ट दूर होते हैं



राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र


Radha Kripa Kataksha Stotram
Radha Kripa Kataksha Stotram


Radha Kripa Kataksh Stotram In Hindi 


मुनीन्द्र–वृन्द–वन्दिते त्रिलोक–शोक–हारिणि
प्रसन्न-वक्त्र-पण्कजे निकुञ्ज-भू-विलासिनि
व्रजेन्द्र–भानु–नन्दिनि व्रजेन्द्र–सूनु–संगते
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१॥


अशोक–वृक्ष–वल्लरी वितान–मण्डप–स्थिते
प्रवालबाल–पल्लव प्रभारुणांघ्रि–कोमले ।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥२॥


अनङ्ग-रण्ग मङ्गल-प्रसङ्ग-भङ्गुर-भ्रुवां
सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्त–बाणपातनैः ।
निरन्तरं वशीकृतप्रतीतनन्दनन्दने
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥३॥


तडित्–सुवर्ण–चम्पक –प्रदीप्त–गौर–विग्रहे
मुख–प्रभा–परास्त–कोटि–शारदेन्दुमण्डले ।
विचित्र-चित्र सञ्चरच्चकोर-शाव-लोचने
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥४॥


मदोन्मदाति–यौवने प्रमोद–मान–मण्डिते
प्रियानुराग–रञ्जिते कला–विलास – पण्डिते ।
अनन्यधन्य–कुञ्जराज्य–कामकेलि–कोविदे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥५॥

अशेष–हावभाव–धीरहीरहार–भूषिते
प्रभूतशातकुम्भ–कुम्भकुम्भि–कुम्भसुस्तनि ।
प्रशस्तमन्द–हास्यचूर्ण पूर्णसौख्य –सागरे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥६॥


मृणाल-वाल-वल्लरी तरङ्ग-रङ्ग-दोर्लते
लताग्र–लास्य–लोल–नील–लोचनावलोकने ।
ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञ–मुग्ध–मोहिनाश्रिते
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥७॥


सुवर्णमलिकाञ्चित –त्रिरेख–कम्बु–कण्ठगे
त्रिसूत्र–मङ्गली-गुण–त्रिरत्न-दीप्ति–दीधिते ।
सलोल–नीलकुन्तल–प्रसून–गुच्छ–गुम्फिते
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥८॥


नितम्ब–बिम्ब–लम्बमान–पुष्पमेखलागुणे
प्रशस्तरत्न-किङ्किणी-कलाप-मध्य मञ्जुले ।
करीन्द्र–शुण्डदण्डिका–वरोहसौभगोरुके
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥९॥


अनेक–मन्त्रनाद–मञ्जु नूपुरारव–स्खलत्
समाज–राजहंस–वंश–निक्वणाति–गौरवे ।
विलोलहेम–वल्लरी–विडम्बिचारु–चङ्क्रमे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१०॥


अनन्त–कोटि–विष्णुलोक–नम्र–पद्मजार्चिते
हिमाद्रिजा–पुलोमजा–विरिञ्चजा-वरप्रदे ।
अपार–सिद्धि–ऋद्धि–दिग्ध–सत्पदाङ्गुली-नखे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥११॥


मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि
त्रिवेद–भारतीश्वरि प्रमाण–शासनेश्वरि ।
रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद–काननेश्वरि
व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते ॥१२॥


इती ममद्भुतं-स्तवं निशम्य भानुनन्दिनी
करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्ष-भाजनम् ।
भवेत्तदैव सञ्चित त्रिरूप–कर्म नाशनं
लभेत्तदा व्रजेन्द्र–सूनु–मण्डल–प्रवेशनम् ॥१३॥


राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः ।
एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥१४॥


यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः ।
राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥१५॥


ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके ।
राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम् ॥१६॥


तस्य सर्वार्थ सिद्धिः स्याद् वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् ।
ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥१७॥


तेन स तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् ।
येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥१८॥


नित्यलीला–प्रवेशं च ददाति श्री-व्रजाधिपः ।
अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥१९॥


॥ इति श्रीमदूर्ध्वाम्नाये श्रीराधिकायाः कृपाकटाक्षस्तोत्रं सम्पूर्णम ॥


यह तथ्य श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र की महिमा और राधा-तत्व की गहराई को दर्शाता है। इसे समझने के लिए हमें भक्ति मार्ग के उस मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पहलू को देखना होगा जहाँ "शक्ति" (राधा) और "शक्तिमान" (कृष्ण) का संबंध परिभाषित है।

यहाँ इसका विस्तृत अर्थ और भावार्थ दिया गया है:

1. राधा रानी: कृष्ण की 'ह्लादिनी शक्ति'

शास्त्रों के अनुसार, राधा जी भगवान श्री कृष्ण की 'ह्लादिनी शक्ति' (आनंद देने वाली शक्ति) हैं। कृष्ण स्वयं पूर्ण हैं, लेकिन वे जिस आनंद का अनुभव करते हैं, वह राधा जी के माध्यम से ही प्रकट होता है।

भाव: जैसे सूर्य को उसकी प्रभा (धूप) से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही कृष्ण को राधा से अलग नहीं किया जा सकता। कृष्ण "विषय" हैं और राधा "आश्रय" हैं।

2. "कृपा कटाक्ष" का अर्थ

'कटाक्ष' का अर्थ है तिरछी नज़र या एक छोटी सी दृष्टि। 'कृपा कटाक्ष' का अर्थ हुआ—राधा जी की वह करुणामयी दृष्टि जो भक्त का कल्याण कर दे।

कहा जाता है कि जब राधा जी किसी पर अपनी करुणा भरी दृष्टि डालती हैं, तो वह जीव कृष्ण की भक्ति के योग्य बन जाता है।

कृष्ण प्रेम के वशीभूत हैं। चूँकि उन्हें राधा जी सबसे प्रिय हैं, इसलिए वे उस भक्त को अपना लेते हैं जिस पर राधा जी की मुहर (स्वीकृति) लग चुकी हो।

3. कृष्ण स्वयं प्रतीक्षा क्यों करते हैं?

भक्ति मार्ग के संतों का मत है कि कृष्ण "भक्त-वत्सल" हैं, लेकिन वे "राधा-वत्सल" भी हैं।

कृष्ण को 'मदन-मोहन' (कामदेव को मोहित करने वाला) कहा जाता है, लेकिन राधा जी को 'मदन-मोहन-मोहिनी' (कृष्ण को भी मोहित करने वाली) कहा जाता है।

जब राधा जी किसी भक्त पर कृपा करती हैं, तो कृष्ण उस भक्त की सेवा स्वीकार करने के लिए लालायित रहते हैं क्योंकि वह भक्त उनकी प्रियतमा (राधा) का प्रिय बन चुका होता है।

4. स्तोत्र पाठ का प्रभाव

"श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र" (जो भगवान शिव द्वारा रचित माना जाता है) का पाठ करने से भक्त के हृदय में वही भाव जागृत होता है जो राधा जी की सेवा का है।

स्वतः कृपा: जब आप इस स्तोत्र का गान करते हैं, तो आप सीधे राधा रानी से प्रार्थना कर रहे होते हैं।

कृष्ण की प्राप्ति: वैष्णव दर्शन में माना जाता है कि कृष्ण तक पहुँचने का सबसे सुलभ मार्ग राधा जी के चरणों से होकर जाता है। यदि राधा जी प्रसन्न हैं, तो कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता; वे तो राधा जी के पीछे-पीछे चले आते हैं।

संक्षेप में निष्कर्ष

"राधा साध्यं साधनं यस्य राधा, मंत्रो राधा मंत्र दात्री च राधा।

सर्वं राधा जीवितं यस्य राधा, कृष्णस्तस्य साध्यते न चिरेण॥"

अर्थात्: जिसका साध्य, साधन, मंत्र और जीवन सब 'राधा' है, उसे श्री कृष्ण बिना किसी विलंब के प्राप्त हो जाते हैं।



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