न,
कुछ न बोलो
मौन पीने दो मुझे
अपनी हथेली से तुम्हारी उँगलियों का कंप
कुछ न बोलो
मौन पीने दो मुझे
अपनी हथेली से तुम्हारी उँगलियों का कंप
उँह, गुज़रते सैलानियों की दृष्टि
अँधेरे को भेद
रह-रह रीढ़ पर से रेंगती थी—अब नहीं है।
नहीं,
कुछ भी तो नहीं,
ऊपर का पखेरू सपने में शायद चिंहुक कर डगमगाया है
डैने तोलता है।
तट की भुजाओं के ढाल
अ-देखे ज्वार की अँगड़ाइयों में टूटते हैं
पार जलती रौशनी के साँप
लहरों पर हुमस कर
इस किनारे तक लपकते हैं
लौटते हैं
सुनो,
बोलना क्या चाहिए ही?
मौन क्या गहराइयों को स्वर नहीं देता?
शब्द तो है वस्त्र,
भावों के—अभावों के।
इस समय अनुभव करें चुप
परस्पर को हम नक़ाबों में ही नहीं हैं
हम निरावृत, अनावरण हैं
क्या चरम-आत्मीय क्षण यों अ-बोले होते नहीं हैं?